महावीर सिंह ( स्वतंत्रता सेनानी ) जीवनी । Mahavir Singh Biography in hindi

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महावीर सिंह ने दृढ़ निश्चय और संकल्प के साथ क्रांति के मार्ग पर कदम रखा था। बिस्मार्क की मुसीबतों का उन्हें पूरा अनुमान था। महावीर सिंह उत्तर प्रदेश के एटा जिले के कासगंज में जन्मे थे। वह आठवीं कक्षा के विद्यार्थी थे तब एक और विदेशी बहिष्कार का शोर था, दूसरी ओर कुछ लोग अंग्रेजी शासन की चाटुकारिता मैं लगे हुए थे। ऐसे ही एक सभा में जिला कलेक्टर, पुलिस के अधिकारी और शिक्षा विभाग के अधिकारी उपस्थित थे। भीड़ बढ़ाने के लिए शिक्षक स्कूल के विद्यार्थियों को लेकर आए हुए थे। वक्तागण गांधीजी की आलोचना कर अंग्रेजी शासन को प्रसन्न कर रहे थे। तभी एक विद्यार्थी चिलाया, महात्मा गांधी की जय ! सारे विद्यार्थी जोरो से चिल्लाए, महात्मा गांधी जी जय।

अंग्रेज जिलाधीश के क्रोथ का परिमाण यह हुआ कि शिक्षकों का डंडा महावीर सिंह पड़ा। महावीर सिंह का विद्रोह भरत उठा, छात्रों का क्रांतिकारी नेता बन गए।

कानपुर के – डी. ए. वी. कॉलेज में इनकी मित्रता शिव बर्मा से हुई। दोनों क्रांतिकारी थे। महावीर सिंह के पिता देवीसिंह भी प्रगतिशील विचारों के थे। उन्होंने यह जानकर कि बेटे ने अपना जीवन देश के समर्पित कर दिया है, उन्होंने आशीर्वाद देकर इस तपस्या के कठिन मार्ग से पीछे मुड़कर न देखने के लिए कहा। इससे वे आनंदित हुए और पढ़ाई छोड़ कर पार्टी के काम में लग गए।

पार्टी के आहान पर महावीर सिंह लाहौर पहुंचे। मोटर चलाने का प्रशिक्षण लिया। जब भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद ने योजनानुसार लाला लाजपत राय के हत्यारे सांडर्स का वध किया, तो महावीर सिंह ने भी उसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वध के पश्चात सभी साइकिलों से भागे और साइकिलें मित्र के पास छोड़कर महावीर सिंह की कार में सुरक्षित स्थान पर पहुंचे।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली असेंबली में बम विस्फोट करके स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी थी। इस समय पार्टी के अधिकांश सदस्य गिरफ्तार हो गए थे, इनमें महावीर सिंह भी एक थे।

महावीर सिंह का कथन था, शासन के साथ हमारी लड़ाई किसी न किसी रूप में चलती रहनी चाहिए। लाहौर जेल में पहुंचते ही पुलिस और जेल अधिकारीयों से उनकी उठापटक आरंभ हो गई। जेल के नियमों की अवहेलना और जेल अधिकारियों से मारपीट की घटनाएं सामान्य हो गई। तगड़े क्रांतिकारी पुलिस की पिटाई भी कर देते थे। इनमें भगत सिंह, महावीर सिंह , जयदेव कपूर , डॉक्टर गया प्रसाद प्रमुख थे। इन लोगों ने जेल के दुर्व्यवहार के विरोध में सामूहिक भूख हड़ताल की। जब वे दस- बारह दिन के भूख हड़ताल पर रहे और उनकी हालत बिगड़ने लगी, तो जेल अधिकारीयों ने उन्हें जीवित रहने के लिए जबरन दूध पिलाने की योजना बनाई। दो डॉक्टर और दस तगड़े पहलवान कैदी जबरदस्ती रबर की नली से दूध पिलाते। कुछ उगल देते, कुछ डॉक्टर की उंगली काट देते। महावीर सिंह को वश में करना बहुत कठिन काम था। वे पहले तो जंगलों के दरवाजे पर खड़े हो जाते, बड़ी मुश्किल से वे लोग जंगले को धक्का देकर खोलने का प्रयत्न करते । ऐसे समय कभी कभी महावीर सिंह तुरंत हट जाते और वे आठ-दस लोग एक साथ एक के ऊपर एक गिर जाते । फिर अकेले उनसे लड़ते।

इस शारीरिक युद्ध के साथ उन्होंने दूसरा प्रकार से भी लड़ाई शुरू की थी। महावीर सिंह, कुंदन लाल, बटुकेश्वर दत्त, डॉक्टर गया प्रसाद और जितेंद्र नाथ सान्याल ने एक संयुक्त बयान दिया, हम पर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध युद्ध छेड़ने का अभियोग लगाया गया है। होम ब्रिटिश सरकार की बनाई हुई किसी भी अदालत से न्याय की आशा नहीं करते और इसलिए हम इस न्याय के नाटक में भाग नहीं लेंगे। केस की सुनवाई समाप्त हो जाने पर उसका फैसला सुना दिया गया। महावीर सिंह और उनके सात साथियों को आजन्म कारावास का दण्ड सुनाया गया। कुछ दिन पंजाब की जेल में रखकर वेल्लोरी जेल में स्थानांतरित कर दिया गया।

वेल्लोरी जेल में पहले ही दिन उनकी अंग्रेज जेल सुपरिटेंडेंट से ठन गई। महावीर सिंह ने जेल की तनीदार टोपी पहनने से इंकार कर दिया। जेल सुपरिटेंडेंट ने पहलवानों की सहायता से बलपूर्वक महावीर सिंह को टोपी पहनवा दी। महावीर सिंह ने अपने सिर को झटके के साथ घुमाया और टोपी जमीन पर गिरा दी। टोपी को कुचलते हुए कहा, भविष्य में महावीर सिंह को टोपी पहनाने का प्रयत्न मत करना।

अंग्रेज सुपरिटेंडेंट ने पहलवानों से दोनों हाथ पकड़वाकर मुक्कों की बौछार कर दी। महावीर सिंह ने अपने बलिष्ठ हाथ को पहलवानों से छुड़ाकर अंग्रेज को ऐसा मुक्का लगाया कि वह नीचे गिर पड़ा। उस दिन से उसकी किसी कैदी को मुक्का मारने की हिम्मत नहीं हुई। परंतु बदला लेने के लिए जेलर ने उन्हें तीस बातों की सजा सुना दी।

हाथ पैर बांधकर निर्वस्त्र नितम्बों पर बेंत प्रहार किए गए , पहले ही बेंत में खून बहने लगा। तीस बेतों मैं खून की धारा के साथ मास भी उधड़ने लगा। पर महावीर सिंह प्रत्येक बेंत के उत्तर में इंकलाब जिंदाबाद और अधिक जोर से कहने लगे। बेंत प्रहार के बाद बेहोश हो जाना निश्चित था। इसलिए स्ट्रेचर तैयार था, परंतु महावीर सिंह ने स्ट्रेचर को ठोकर मार जेलर की और घृणा से देखा और पैदल ही अपनी कोठरी की और चले गए। जेलर भी दहशत खा गया।

जनवरी सन 1933 में चुने गए 84 क्रांतिकारियों को कालेपानी भेज दिया गया , उनमें महावीर भी एक थे। कालेपानी की सजा खतरनाक समझे जाने बाले कैदियों को ही मिलती थी । क्रांतिकारियों का यह जत्था यहां पहुंच कर ठहाके लगाने लगा। जेल अधिकारियों को यह नागवारा गुज़रा। उन्होंने सख्ती की हद कर दी।

अंडमान की खबरें शेष भारत में नहीं पहुंचती थी। महावीर सिंह ने कहा कि सामूहिक अनशन किया जाए और खबर भारत तक पहुंचाने की तिकड़म भिड़ाई जाए। महावीर सिंह ने कहा, पहले तो लोग बलिदान करें, जिसमें से एक में और दूसरा कोई और होगा जिसका नाम पर्ची डाल कर निकाला जाए। इस पर सबने कहा, दोनों नाम पर्ची डालकर निकाले जाए। पर्ची दो बंगाली युवकों के नाम खुली। सामूहिक अनशन हुआ। भयंकर गर्मी में क्रांतिकारियों की तबीयतें बिगड़ने लगी, जबरन दूध पिलाने का प्रयत्न हुआ। महावीर सिंह को डॉक्टरों और पठान कैदियों ने मिलकर दूध पिलाने की जबरन कोशिश की। नली का दूध पेट में न जाकर फेफड़े में चला गया, परिणामस्वरूप महावीर सिंह की आंखें उलट गई। दोनों बना ली युवकों ने भी दूध पीने का पूरा विरोध किया और अपनी जान दे दी। तीनों की लाशे समुंद्र में फिंकवा दी गई।

महावीर सिंह ने किसी तरह वार्डन को पटाकर अनशन की खबर बाहर भिजवा दी थी, जिससे भारत में बहुत असंतोष उभरा और ब्रिटिश सरकार को अंडमान के राजबंदियों को सुविधाएं देनी पड़ी।

महावीर सिंह की व्यक्तिगत वस्तुओं में साथी जयदेव कपूर को, उनके पिता को भेजा गया पत्र और कविता मिली, जिसका आरंभ इस प्रकार था –

मैंने देखा मृत्यु निमंत्रण, उसके द्वारा आया।
अत्याचारी से आगे बढ़, जो पहले टकराया ।।

महावीर सिंह ने देश के लिए अपने प्राणों का समर्पण बहुत पहले ही कर दिया था। केवल प्राण विसर्जन की औपचारिकता शेष रह गई थी।

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