चंद्रशेखर आजाद का जीवनी – Chandrashekhar Azad Biography in hindi

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भारतीय स्वतंत्रय संग्राम में क्रांति की अवधारणा को एक तार्किक परिप्रेक्ष्य देने वाले सेनानायकों में चंद्रशेखर आजाद का नाम अग्रगण्य है। वे उत्कट देशभक्त, निस्सीम त्याग , अपरिमित शौर्य, अद्भुत साहस और अनुभवी सैन्य नेतृत्व की साकार प्रतिमा थे। अलीराजपुर जिले (मध्य प्रदेश) के भाबरा नामक ग्राम को 23 जुलाई 1906 को उनकी मातृभूमि बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनके पिता सीताराम तिवारी संयुक्त प्रांत के उन्नाव जिले के बदरका ग्राम से भीषण दुर्भिक्ष के करण अपने सम्बन्धियों के साथ यहां आ बसे थे। आज भाबरा ग्राम मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ जिले में है। उस समय उस गांव में दो चार ब्राह्मणों की झोंपड़ियों को छोड़कर सारी बस्ती भील और मुसलमान लोगों की थी। सीताराम तिवारी गांव के सीमा पर एक झोपड़ी में रहते थे। आजीविका के लिए एक बाग में रखवाली करते थे। वे अत्यंत निर्धन, सदाचारी, ईमानदार किंतु क्रोधी स्वभाव के थे। चंद्रशेखर उनकी पाचवी संतान थे। तीन संतानों अल्पायु रही थी। इस पांचवी संतान का पालन पोषण उनकी माता ने अत्यंत कष्ट से निर्धनता में किया था।

निर्भीकता चंद्रशेखर के स्वभाव में जन्मजात थी। अचूक निशाना साधना संभवत उन्होंने भील बालोंको से ही सीख लिए थे। एक बार वह घर से अचानक बिना किसी को बताए बनारस जा पहुंचे। संस्कृत सीखने की अपनी इच्छा अपने साथियों पर प्राय: व्यक्त किया करते थे। अतः बनारस पहुंच कर एक मठ में संस्कृत का अध्ययन करने लगे। घर की दयनीय आर्थिक स्थिति और पिताजी का क्रोध स्वभाव और फिर संस्कृत पढ़ने की अभिलाषा ही उन्हें बनारस में खीच लाई थी।

चंद्रशेखर का क्रन्तिकारी जीवन 

देश में सर्वत्र असहयोग आंदोलन का वातावरण था। विदेशी कपड़ों के बहिष्कार भारत भर में धूम थी। 1921 में चंद्रशेखर 14 वर्ष के किशोर थे। इस किशोर अवस्था में वे इस स्वदेशी आंदोलन में सम्मिलित हो गए। भावरा की कठिन परिस्थितियों ने उन्हें कष्टसहिष्णु कठोर परिश्रमी, विकेट परिस्थिति में संघर्ष करने बाला बना दिया था। इस वर्ष के अंत में ब्रिटानिका युवराज डयूक आंफ विंडसर भारत यात्रा पर आए। कांग्रेस ने उनके आगमन का विरोध किया। सर्वत्र हड़ताल रखी गई। कहीं-कहीं दंगे भी हुए। सरकार ने अपना दमनचक्र प्रारंभ किया। महात्मा गांधी को 6 महीने का कारावास मिला। चंद्रशेखर ने बनारस के सरकारी विद्यालय पर धरना दिया। इसी अपराध में इस किशोर पर मुकदमा चला। मुकदमे के न्यायधीश खारेघाट नामक एक पारसी व्यक्ति थे। सुनवाई के दौरान चंद्रशेखर ने जो उत्तर दिए, वे इतिहास की धरोहर है। न्यायाधीश ने पूछा, तुम्हारा नाम आजाद पिता का नाम स्वतंत्र , कहां के रहने वाले हो जल खाने के। चंद्रशेखर के इन निर्भीक उत्तर से खारेघाट क्रोध हो उठे। उन्होंने इस बालक को 15 कोड़ों की सजा सुनाई। उनके साथियों को जिले के कारागृह में भेजा गया और उन्हें केंद्रीय जेल में। वहां क्या जेल अधीक्षक गंगा सिंह राजनीति केंद्रीय को यातना देने के लिए प्रसिद्ध था। सिपाहियों ने जब आजाद को मारने के लिए बांधना शुरू किया तो वे बोले बांधते क्यों हो ? मारो मैं खड़ा हूं। सिपाही उनके नंगे बदन पर कोड़े बरसा रहे थे और वे वंदे मातरम ! महात्मा गांधी की जय! और गांधी बाबा की जय! के नारे लगा रहे थे। शरीर से खून बहने लगा, पर वो नारे लगाते रहे। अंत में मूर्छित होकर गिर पड़े।

किशोर बालक चंद्रशेखर के कष्ट सहने की अद्भुत और रोमांचकारी कहानी वायुवेग से सारे बनारस शहर में फैल गई। शहर कांग्रेस समिति ने उनके अभिनंदन के लिए एक आमसभा की घोषणा की। उस सभा में हजारों व्यक्ति उस किशोर क्रांतिकारी के दर्शन के लिए अत्यंत उत्साह से एकत्रित हुए। श्री मन्मथनाथ गुप्त लिखते है कि इस सभा में चंद्रशेखर का अभिनंदन उनकी वीरता के अनुरूप ही हुआ। काशी के इतिहास में वह एक अविस्मरणीय घटना है। सॉरी काशी नगरी आततायी सरकार से टक्कर लेने वाले उस किशोर को देखने व उसका प्रेम से अभिनंदन करने के लिए उमर पड़ी थी। अनेकों के भाषण हुए। आजाद को मंच पर लाया गया। छोटे से आजाद और दूर तक फैली भीर। लोगों ने महात्मा गांधी की जय के नारों से सारा वातावरण गुंजायमान कर दिया। चंद्रशेखर ने छोटा सा भाषण दिया। उनका सारा शरीर असंख्य हारों से ढंक गया। उनकी आंखें सिंह की आंखों के चमक रही थी। उस दिन से चंद्रशेखर तिवारी चंद्रशेखर आजाद हो गए।

बनारस के प्रसिद्ध देशभक्त शिव प्रसाद गुप्त ने आजाद को अपने संरक्षण में लेकर काशी के राष्ट्रीय विद्यापीठ में भर्ती कर दिया। पहले दिन ही उनके दर्शनों के लिए विद्यार्थीयों की भीड़ उमर पड़ी। थोड़े ही दिनों में चंद्रशेखर ने शिवप्रसाद का घर भी छोड़ दिया। शिक्षा अब उनका लक्ष्य नहीं था। उन्होंने आजादी प्राप्त करने की दिशा में स्वयं को समर्पित कर दिया था

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन दल संगठन

चौरीचौरा कांड के कारण असहयोग आंदोलन स्थगित हो गया और महात्मा गांधी के अहिंसक मार्ग से उनकी आस्था डिगने लगी। इसी समय प्रख्यात क्रांतिकारी शचींद्रनाथ सान्याल संयुक्त प्रांत में क्रांतिकारियों को संगठित कर रहे थे। श्री सान्याल कुछ ही दिनों पूर्व अंडमान से छूट कर आए थे। उनकी बंदी जीवन पुस्तक उस समय तक प्रसिद्ध हो चुकी थी। उस पुस्तक को पढ़कर अनेक लोग क्रांति की और आकर्षित हुए। श्री सान्याल ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन नामक एक दल तैयार किया। उसका नेतृत्व राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को सौंपा गया। प्रणवेश चटर्जी इस सभा के सदस्य थे। उनका ध्यान चंद्रशेखर आजाद की और गया। चंद्रशेखर आजाद विद्यापीठ की पढ़ाई छोड़ कर पुनः मठ में संस्कृत पढ़ने लगे थे। सम्भवतः मठ में स्वतंत्रता संघर्ष के अनुकूल वातावरण रहा होगा। चटर्जी ने मन्मथनाथ गुप्त को आजाद को इस सभा का सदस्य बनाने का काम सौंपा। आजाद तो मानो तैयार ही बैठे थे ‌। उन्होंने सदस्य बनना स्वीकार कर लिया। शीघ्र ही वे अपनी योग्यता के कारण अंतरंग समिति के सदस्य भी बना लिये गए।

चंद्रशेखर की अंतरंग दल का जीवन – और संस्था का उद्देश्य

चंद्रशेखर आजाद ने इस संस्था में नवीन कार्यकर्ताओं को जोड़ा। संस्था का उद्देश्य न केवल स्वतंत्रता प्राप्त करना, अपितु शोषणरहित प्रजातंत्र की स्थापना करना भी था। इस दल में तरुण व अत्यंत विश्वासपात्र व्यक्तियों की ही भर्ती की जाती थी। उनकी समितियां बनाकर उन्हें भिन्न भिन्न कार्य दिए जाते थे। उनके मार्गदर्शन के लिए नियमित रूप से पथ प्रदर्शक पाठ्यक्रम व बौद्धिक केंद्रों की व्यवस्था की गई। शारीरिक शक्ति के लिए अखाड़े चलाना, शस्त्रास्त्र व विस्फोटक वस्तुओं का संग्रह, पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं के लिए संगठन के इतर कार्यों के लिए निधि संग्रह करना आदि कार्य संगठन के समक्ष थे। संगठन की गोपनीयता आवश्यकता थी। धन के अभाव में कार्यक्रमों में बाधा पहुंचने लगी। आर्थिक अड़चनों से टक्कर लेने के लिए संगठन के सदस्यों ने डाके डालने का निर्णय लिया।

संगठन के प्रत्येक ऐसे कार्य एक्शन कहे जाते थे। राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आजाद और उनके साथियों ने द्वारिकापुरी में डाका डालने का निश्चय किया। सभी क्रांतिकारी बनारस की एक धर्मशाला में एकत्रित हुए। तभी रामशंकर नामक व्यक्ति से बातें बातें में पिस्तौल का ट्रिगर दब गया। गोली की आवाज सुनकर सभी डर गए कि इस गोली का निशाना कौन बना होगा और इस धड़ाके की कमरे के बाहर क्या प्रतिक्रिया हुई होगी। चंद्रशेखर प्रत्युत्पत्रमति थे। इन्होंने पीने के लिए लाकर रखी हुई सोडा लेमन की बोतले में से एक उठाकर जमीन पर पटक कर फोड़ डाली और सबसे एक एक दो-दो की संख्या में बाहर जाने का कहां। सब लोग एक एक दो-दो की संख्या में स्टेशन पहुंचने लगे

चंद्रशेखर बाहर आकर पाने वाले से झगड़ने लगे कि तुमने कैसी बोतले दी है? इनमें इतनी गैस भारी है कि एक बोतल जोर से फूटी मानो बम फूटा है। मेरे मेहमानों को कुछ हो जाता तो ? पानवाला क्षमा मांगता रहा और वे तब तक झगड़ते रहे जब तक भीड़ नहीं जमा हो गई। जब इन्हें विश्वास हो गया कि उनके झगड़े को देख सुनकर लोगों ने गोली की आवाज को बोतल की आवाज ही समझा है और अब तक बारूद की गंध भी समाप्त हो गई होगी, तब कहीं जाकर ये चुप हुए और गाड़ी छुटने के पूर्व ही स्टेशन पर पहुंच गए।

चंद्रशेखर आजाद का जीवनी - Chandrashekhar Azad Biography in hindi
चंद्रशेखर आजाद का जीवनी – Chandrashekhar Azad Biography in hindi

द्वारकापुरी आने के पहले ही वे प्रतापगढ़ में उतर गए। प्रतापगढ़ से पैदल चलकर द्वारकापुरी पहुंचे। इस सेक्शन में आजाद ने पिस्तौल जमीन पर रखकर दोनों हाथों से साहूकार को पकड़ लिया। इस बीच उस घर की स्त्रियों ने पिस्तौल छिपा ली। क्रांतिकारी माल चादर मैं बांधकर लौटने लगे।उस चादर को एक और उसे क्रांतिकारी रामकृष्ण खत्री और दूसरी ओर से लाहिड़ी पकड़े हुए थे। गांववाले के अचूक निशाने से अपने को बचाते हुए वे चल रहे थे कि इतने में गड्ढे में गिर पड़े। बिस्मिल का आदेश था कि किसी को गोली नहीं मारी जाए, इसलिए गांव वाले पीछा करते हुए आ रहे थे।इस डकैती में हाथ तो कुछ लगा नहीं, उल्टे आजाद ने अपनी पिस्तौल भी गवा दी। इसलिए बिस्मिल ने एक्शन के समय शास्त्र गोले में बांधने का आदेश दिया।

दल के सामने पैसे की आवश्यकता मुंह फाड़े खड़ी थी। कार्यकर्ताओं के पास बदलने तक को वस्त्र नहीं थे। शरीर के कपड़े फट चुके थे। कुछ को तो बिल्कुल उपवास करना पड़ रहा था। आजाद धन की उस तत्काल आवश्यकता को लेकर चिंतित है। वह सुबह से आधी रात तक दल के कार्य में जुटे रहते। वकील डॉक्टर साधु वह व्यापारी सभी से मेलजोल बढ़ाते रहते थे। उसके पास भरी हुई पिस्तौल सदैव रहती, जबकि अन्य सदस्यों को एक्शन के अतिरिक्त पिस्तौल रखने की अनुमति नहीं थी। वह सर्राफा बाजार में धनी व्यापारियों की तलाश में घूमते रहते पर उन्हें ऐसा कोई अवसर नहीं मिला।

रामकृष्ण खत्री जीवन परिचय। Ramkrishna khatri biography 

रामकृष्ण खत्री उस समय उदासी साधु थे। उनका परिचय गाजीपुर में गंगा के तट पर स्थित उदासी साधुओं के महंत अत्यंत रूग्ण थे, उनको तत्काल योग्य शिष्य की आवश्यकता थी।खत्री जी ने यह बात आजाद को बता दी। वह शिष्य बनने के लिए तुरंत तैयार हो गए। डकैती की तुलना में धन प्राप्ति का यह साधन श्रेष्ठ था। आजाद ने उन महंतजी की इतनी सेवा की कि मरणोन्मुख स्वामी जी पूर्ण स्वस्थ हो गए और आजाद को पीछा छुड़ाने के लिए भागकर बनारस आना पड़ा।

काकोरी कांड कहां हुआ था । काकोरी ट्रेन डकैती कांड’ के क्रांतिकारी कौन थे 

चंद्रशेखर आजाद का जीवनी - Chandrashekhar Azad Biography in hindi
चंद्रशेखर आजाद का जीवनी – Chandrashekhar Azad Biography in hindi

संगठन का विस्तार हो रहा था और आर्थिक संकट गंभीर से गंभीर होता जा रहा था। संगठन ने उत्तर भारत के अनेक शहरों में दो दो तीन-तीन मकान किराया पर ले रखे थे। आगरा और दिल्ली में बम बनाने के कारखाने थे। झांसी के पास की एक दो रियासत में शास्त्र संचालन का परीक्षण दिया जाता था। इतने सारे खर्च थोड़े से चंदे के भरोसे कैसे निपटें, इसलिए डकैती आवश्यक लगने लगे थे।

1925 में दल के नेताओं की बैठक में राम प्रसाद बिस्मिल ने लखनऊ जाने वाली पैसेंजर ट्रेन में रखे सरकारी खजाने को लूटने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने देख लिया था गार्ड के डिब्बे में एक संदूक रहता है, जिसमें सभी स्टेशन में ला लाकर सील बंद रकम डाली जाती है। अशफाक उला खा ने इसका विरोध किया कि इस प्रकार सरकार की नजरें में आने का खतरा है पर अन्य की सहमति होने के कारण यह प्रस्ताव मान लिया गया। 9 अगस्त 1925 को योजना के मुर्त रूप देने का निश्चय किया गाड़ी के लखनऊ से पहले स्टेशन के समीप रोक कर लूटने की योजना बनी। योजना अनुसार राजेंद्र नाथ लाहिड़ी व शचीन्द्र नाथ बक्शी ने द्वितीय श्रेणी वह चंद्रशेखर आजाद केशव चक्रवर्ती मुरारीलाल, मुकुंदीलाल, बनवारी लाल, राम प्रसाद बिस्मिल व मन्मथनाथ गुप्त ने श्रेणी के टिकट लिए।

राजेंद्रनाथ लाहिड़ी व शचिंद्र नाथ बख्शी काकोरी स्टेशन से चढ़े। गाड़ी छूटते ही उन्होंने जेवरात का डिब्बा छूट जाने का बहाने सांकल खींच कर गाड़ी रोक दी। वे 10 लोग नीचे उतरे। रेलगाड़ी के गार्ड और ड्राइवर दोनों अंग्रेज थे। डकैती डालने वाले ने उन्हें नीचे उतारकर चुपचाप लेटे रहने का आदेश दिया। यात्रियों को नीचे न उतरने की सखत हिदायत दी गई। इस 10 कांति कारी ने बीस-पच्चीस मिनट में गारी में रखा खजाना लूट लिया। अंग्रेज गार्ड और ड्राइवर इस अप्रत्याशित घटना से इतने घबरा गए कि क्रांतिकारियों के चले जाने पर भी वे अपनी जगह से नहीं हिले। प्रवासी अंग्रेज इंजीनियर शौचालय में छिपा रहा। दो सैनिक अधिकारियों बेंच के नीचे छिपे रहे।

क्रांतिकारियों ने लखनऊ पहुंचकर सर्वप्रथम नोट बदलने का काम किया। कुछ नोट जो बदल नहीं जा सके वे शाहजहांपुर में पाए गए। इसी आधार पर राम प्रसाद बिस्मिल पकड़े गए। अंग्रेज हुकूमत को यह विश्वास था कि यह कार्य क्रांतिकारियों का है। अतः बिना किसी सबूत के शक के दायरे में आने वाले सभी क्रांतिकारियों को पकड़ना शुरू कर दिया गया। ककरी कांड में केवल दस क्रांतिकारी पकड़े गए। सरकार ने गिरफ्तार क्रांतिकारियों को अलग-अलग जेल में बंद कर उनमें मनमुटाव पैदा करने की भरपूर कोशिश की। कुछ के मुखबिर बन जाने के कारण 25 क्रांतिकारियों पर मुकदमा चलिए। क्रांतिकारियों की ओर से पहले कोई वकील सामने नहीं आया। फिर मोतीलाल जी नेहरू के सामने आने पर गोविंद वल्लभ पंत, चन्द्रभानु गुप्त, मोहनलाल सक्सेना, अजीतप्रसाद जैन, वी.के. चौधरी आदि ने भी इस मुकदमे मैं पैरवी की।

काकोरी कांड के अभियुक्तों को फांसी होगी, यह चर्चा सर्वत्र थी। चंद्रशेखर इसे सुनकर अपने साथियों की सम्भाव्य नियति की कल्पना करके अत्यंत विकल हो उठे। ध्यान रखने के बात यह भी है कि चंद्रशेखर आजाद काकोरी केस के अकेले ऐसे क्रांतिकारी थे। जो अन्त तक पकड़े नहीं जा सके। फरवरी 1937 में अंतिम शहादत से पहले पुलिस उनकी छाया तक को नहीं छु पाई। उन्होंने कोट ले जाते समय पुलिस की सशस्त्र वह सज्जित गाड़ी पर आक्रमण करने की जैसी साहसी योजना बनाई। परंतु दुर्भाग्य से पुलिस को उनकी खबर लग गई।

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य कौन कौन थे। और संचालन कैसे किया जाता था

संगठन को काकोरी कांड की धरपकड़ से जबरदस्त झटका लगा। आजाद काफी समय तक अज्ञातवास में रहे। झांसी और ओरछा रियासत के जंगलों में भटकते रहे। अव वे हरिशंकर ब्रह्माचार्य थे। झांसी में उन्होंने क्रांति दल की एक शाखा स्थापित की

भगत सिंह, सुखदेव , राजगुरु, भगवान दास माहौर, सदाशिव राव मलकापुरकर , विश्वनाथ राव , वैशम्पायन , जयदेव कपूर, विजय कुमार सिन्हा, यशपाल ,प्रो नंदकिशोर निगम, कुंदन लाल, काशीराम, राजेंद्र पाल सिंह, सुरेंद्र पांडे, भगवतीचरण बोहरा , दुर्गा भाभी, सुशीला दीदी, डॉक्टर गयाप्रसाद, हंसराज वायरलेस, सुखदेव राज, प्रकाशवती पाल, महावीर सिंह, बटुकेश्वर दत्त, विमल प्रसाद जैन आदि अनेक इस नवगठित दल के सदस्य थे। इस दल का नाम (हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन एंड आर्मी ) रखा गया। दल के सात सदस्यीय केंद्रीय समिति के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद थे। उन्होंने अनेक स्थानों पर अपनी सेना के केंद्र स्थापित किए , सेनापति के वो रहने का स्थान हमेशा बदलते रहते थे।

साइमन कमीशन के विरोध में हुई है प्रदर्शन के अवसर पर लाला लाजपत राय की पुलिस की मार के कारण मृत्यु हो गई। जिसके प्रति शोध के लिए सांडर्स की हत्या की योजना रची गई। इस योजना का नेतृत्व चंद्रशेखर के हाथों में था। सांडर्स हेड कांस्टेबल चानन सिंह के साथ मोटरसाइकिल पर पुलिस थाने से निकला। निकलते ही दो क्रांतिकारियों ने गोली चला कर उसे नीचे गिरा दिया। चानन सिंह ने भागते हुए साइकिल सवारों का पीछा किया। वे दयानंद आर्ट्स कॉलेज हॉस्टल के दरवाजे से अंदर घुसे। दरवाजे पर चंद्रशेखर खड़े थे। उन्होंने चानन सिंह से आक्रमणकारियों का पीछा ना करने का प्रार्थना की। उसके न मानने पर चंद्रशेखर ने उसे गोली से उड़ा दिया। जिस समय भगत सिंह और राजगुरु पुलिस थाने पर हमला कर रहे थे चंद्रशेखर भी थोड़ी दूर पर खड़े थे। पुलिस ने छात्रावास को चारों तरफ से घेर लिया। संपूर्ण लाहौर में गुप्तचर लगा दिए गए। लाहौर से बाहर जाने वाले सभी मार्गों पर पहरेदार नियुक्त कर दिए गए। रेलवे स्टेशन पर पुलिस का गुप्त जाल बिछा हुआ था। इतना सखत बंदोबस्त के बावजूद दूसरे दिन लाहौर शहर में स्थान स्थान पर दीवारों पर पर्ची चिपके हुए थे , जिन पर लाल स्याही से लिखा हुआ था कि सांडर्स मारा गया, लालाजी का बदला ले लिया गया, क्रांति चिरायु हो। सांडर्स वध के लिए अंग्रेजी शासन किसी को भी नहीं पकड़ सका। भगत सिंह और राजगुरु दुर्गा भाभी के साथ लाहौर से निकलकर कोलकाता पहुंच गए। आजाद भी एक ब्राह्मण के भेष में वृद्ध ब्राह्मणों के साथ लाहौर से बाहर आ गए।

धीरे-धीरे जनता के मन में क्रांतिकारियों के प्रति श्रद्धा उत्पन्न होने लगी थी। विशेष रुप से क्रांतिकारियों कांड के अभियुक्तों के साथ अंग्रेजों ने जो अत्याचार किए थे उनके विवरण सुन पढ़कर जनता कुछ जागरुक हो गई थी। अनेक उदारमना लोगो ने आर्थिक सहायता गुप्त के रूप में दी। आजाद यह सारा धन बम निर्माण करने सशस्त्र की खरीद में, पर्चे छप कर बांटने में खर्च करते थे, कोलकाता लाहौर आगरा सहारनपुर में बम बनाने के कर खाने खोले गए। कानपुर में स्वयं आजाद की निगरानी में यतीन्द्रनाथ दास के कुशल मार्गदर्शन में बम बनाए जाने लगे और तरुणों को तैयार करने के लिए परीक्षण दिया जाने लगा।

9 अप्रैल 1929 के केंद्रीय विधानसभा में बम विस्फोट की ऐतिहासिक घटना घटित हुई। यह साहसी कार्य सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने किया था। बम विस्फोट के विषय में दल में पूर्ण विचार विमर्श हुआ था। दल का प्रत्येक व्यक्ति जानता था कि दोनों पकड़े जाएंगे और उन्हें फांसी की सजा होगी। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने स्वयं गिरफ्तारी दी, क्योंकि वे न्यायालय को क्रांतिकारी के प्रचार का माध्यम बनाना चाहते थे। इस संदर्भ में सरकार चंद्रशेखर आजाद को पकड़ने का पूर्ण प्रयत्न कर रहे थे, परंतु आजाद वह अनके अनन्य मित्र -साहित्यकार यशपाल तथा अन्य सात साथी फरार हो रहे ।

प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों की अपेक्षाएं धूल में मिला दी थी। इस असंतोष का विस्फोट 23 दिसंबर 1929 को गवर्नर आयरविन की विशेष गाड़ी के नीचे बम विस्फोट के रूप में हुआ। गांधी जी ने “कल्ट आफ द बांम्ब” नामक लेख लिखकर इसका विरोध किया, जिसके उत्तर में 26 जनवरी 1930 को फिलासफी आफ द बांम्ब पर्चा बाटा गया। इसके लेखक यशपाल व भगवती चरण बोहरा थे, परंतु सारी व्यवस्था चंद्रशेखर आजाद की थी । आयरविन की विशेष गाड़ी पर बम फेंकने का अभियोग मैं सरकार चंद्रशेखर आजाद को पकड़ना चाहती थी। फरार आरोपियों की सूची में उनका नाम था तथापि वह भगत सिंह और राजगुरु को छुराने के पयत्न में लगे थे। परंतु उनकी यह योजना असफल हुई।

चंद्रशेखर आजाद की मृत्यु कब और कहां हुई? – Chandrashekhar story in Hindi

चंद्रशेखर आजाद का जीवनी - Chandrashekhar Azad Biography in hindi

दल ने चंद्रशेखर पर किसी भी एक्शन में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा रखा था। उनके मित्र धन जुटाने के लिए अवसर खोजते रहते थे। परंतु कोई उपाय सुझ नहीं रहा था। तब आजाद ने ही एक योजना बनाई और शेवरलेट गाड़ी में शास्त्र सज्जित होकर रात के नौ – दस बजे वे अपने साथियों सहित निकले। कार को कंपनी बाग, दिल्ली में छोड़ दिया गया और ड्राइवर के आदेश दिया गया कि साथियों का इशारा मिलते ही कार को चालू कर देना। सहकारी को फाटक पर छोड़कर वे स्वयं चांदनी चौक के गाड़ोदिया स्टोर्स मैं घुसे । खजांची को छोड़कर सब कर्मचारियों को पिस्तौल की नोक पर एक कमरे में बंद कर दिया। तेरह हजार रुपया लेकर दौड़ते हुए कंपनी बाग में आए । कार चालू थी। इस खुली कार में चारों दिशाओं से शस्त्र लेकर क्रांतिकारियों बैठे गए और कार शीघ्रता से चल पड़ी। रास्ते में कार रोकने की चेष्टा करने वाले मि. पिची को आजाद ने धक्का देकर गिरा दिया। खूब दूर निकल जाने पर आजाद रुपए लेकर एक छात्रावास के अध्यक्ष के घर रुके। मित्रों को कार लेकर दूर भेज दिया। पुलिस छात्रावास में आई अधीक्षक ने कहां छुट्टियां होने के कारण छात्रावास सुनसान है। एक कार मेरे बच्चे को लेकर अवश्य आई थी। पूरे दिन आजाद छात्रावास से भी निकल गए। पुलिस कोई पता नहीं लगा सकी।

आजाद विकट और विपरीत परिस्थिति में भी अचूक साहसिक निर्णय लिया करते थे। उनके मित्र विश्वनाथ का कथन है कि सीआईडी उन्हें जीवित या मृत पकड़ने के लिए हाथ धोकर पीछे पड़ी थी। उन्हीं दिनों का बात है कानपुर के सीआईडी इंचार्ज राय साहेब शंभू नाथ को खबर मिली कि गरम साल ओढ़कर आजाद इलाहाबाद से कानपुर जा रहे हैं। उनका रंग सांवला कद ऊंचा और शरीर तगड़ा है। खबर सही थी। जब आजाद वैशम्पायन के साथ जाने के लिए निकले, तब वह सचमुच गरम शाल ओढ़े हुए थे। रास्ते में दर्जी की दुकान से लेकर सूट पहनना और उतारे हुए कपड़े लपेटकर हाथों में ले लिए। ट्रेन जब कानपुर पहुंची तो उन्हें देखा कि दोनों और पुलिस खड़ी है। उन्हें समझने में देर नहीं लगी कि पुलिस किस के स्वागत के लिए सज्जित है। उन्होंने वैशम्पायन को अपने साथ न रहने का निर्देश दिया। एक स्थान पर दो व्यक्तियों को जीवन के संकट में डालना उचित नहीं है।वैशम्पायन ने अपने नेता के आदेश का पालन करना अस्वीकार कर दिया। दोनों ही अपने सन्दूके संभालते हुए बाहर आए।

बाहर निकल कर उन्होंने भीड़ से निकलने की जल्दबाजी न करते हुए एक बेंच पर बैठना ठीक समझा। कुली से कहा। मेरी छाती में दर्द है। में थोड़ा आराम करना चाहता हूं। देरी का पैसा चुका दूंगा। भीड़ कम होने तक उन्होंने बेंच पर आराम किया। इस समय तक सीआईडी और पुलिस वाले भी चले गए। उन्हें लगा या तो खबर गलत थी या आजाद ने अपनी यात्रा रद्द कर दी होगी। कानपुर में वे राय साहेब शंभू नाथ के ही घर के ऊपर की मंजिल पर जाकर ठहरे।

काकोरी कांड के समय से ही फरार चंद्रशेखर को छायाचित्र रेल को बड़े बड़े स्टेशनों और चौक पर लगी हुई थे। उन पर मोटी धनराशि का पुरस्कार घोषित किया गया था। परंतु उन्हें पकड़ना कठिन काम था। जीवन के आखिरी दिनों में उनका मन कुछ बेचैन सा रहने लगा था। उनके मित्र गिरफ्तार हो गए थे और जो शेष थे विश्वास के योग्य नहीं रहे थे। उनके ऐसे ही मित्रों में एक थे वीरभद्र तिवारी जिनके जिसका विश्वासघात से 27 फरवरी 1931 का दिन भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के लिए काला दिन बनकर आया। उसी दिन इलाहाबाद के अल्फ्रेंड पार्क में ब्रिटिश साम्राज्यशाही से सशस्त्र टक्कर लेते हुए अजय सेनानी आजाद ने अपनी प्राणहुति दे दी।

क्रांति दल ने यशपाल की रूसी क्रांति को समझने व उसका अध्यान करने के लिए रूस भेजने का निर्णय किया। चंद्रशेखर आजाद ने उन्हें आर्थिक सहायता देना स्वीकार किया । उन्हें डेढ़ हजार रुपयों की पहली किस्त दे दी गई। कुछ दिन और देना था। 27 फरवरी को यशपाल और सुरेंद्र पांडे इलाहाबाद के कटरा बाजार से निकले ।अल्फ्रेंड पार्क में उनकी भेंट सुखदेव राज से हुई। यशपाल स्वेटर खरीदने चले गए। किंतु आजाद और सुखदेव राज पार्क में रुके रहे। तभी एक व्यक्ति ने आजाद को गौर से देखा। सुखदेव राज ने आजाद से उस व्यक्ति के विषय में शंका व्यक्त की। आजाद ने उधर ध्यान ना दे कर एक अन्य व्यक्ति की और उंगली उठा कर कर कहे। यह वीरभद्र है। वीरभद्र ने भी दूर से आजाद को देखा। वह आजाद की निगरानी ही कर रहा था। फिर भी आजाद ने उसे गंभीरता से नहीं लिया

वीरभद्र ने तत्काल इलाहाबाद विश्वविद्यालय जाकर पुलिस थाने पर उनकी सूचना दे दी। सूचना मिलते ही डी.एस. पी. ठाकुर विश्वेश्वर सिंह, गुप्तचर विभाग के प्रमुख एस. टी. हांकिन्सथ वह कानूनी सलाहकार डाल चंद्र ये सब वहां पहुंचे। पार्क में प्रवेश करते समय जिसने आजाद को गौर से देखा था वह डालचंद्र था। उसने पुलिस अधीक्षक नाट बाबर को बुला लिया। नांट बाबर सशस्त्र पुलिस की टुकड़ी सहित पार्क में आए।

आप चंद्रशेखर को चारों और पुलिस थी।नाट बाबर को तुम कौन हो? प्रश्न का उत्तर चंद्रशेखर की पिस्तौल से छुट्टी हुई गोली से मिला। नाट बाबर एक पेड़ के पीछे छिप गया। उसके मातहत अधिकारी नाली की ओर बढ़े। आजाद ने सुखदेव राज को भागने का आदेश दिया। ठाकुर विश्वेश्वर सिंह पचास- साठ फुट की दूरी से झारी से गोली दाग रहे था। आजाद अचूक निशानेबाज थे। गुना निशाना साध कर ठाकुर को मूर्ख का बड़ा हिस्सा फोड़ दिया। आजाद पर चारों ओर से गोली की वर्षा होने लगी। तब भी लगभग बीस मिनट तक वे साहस से लड़ते रहे। इतने सिपाही और इतना असला होने के बावजूद वे उन्हें नहीं पकड़ सके। उनके गोलियां आजाद को शरीर में घुस गई और वे जमीन पर गिर पड़े। तब उन्हें स्वयं एक गोली अपने सीने पर दाग ली। चंद्रशेखर की मृतदेह के समीप भी जाने की किसी को हिम्मत नहीं था। आजाद हमेशा कहा करते थे कि मैं जीते जी अंग्रेज हुकूमत के हाथ नहीं लगूंगा। और उन्होंने अपने यह प्रतिज्ञा पूर्ण की।

जनता का आदर और उत्साह देखकर ने शहीद स्थल के वृक्ष को काट डाला। स्वतंत्रता के पश्चात बाबा राघव दास ने उसी जगह पून: वृक्ष रोपण किया। डॉ. भगवानदास मोहर लिखते हैं-हमारे दल में कुछ लोग प्रेम गीत लिखा और गया करते थे। उस पर चिढ़कर आजाद ने कहा, जीवन में कहां प्रेम-वेम? मेरी कविता सुने

चन्द्रशेखर आजाद की शायरी | Chandrashekhar Azad quotes

दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे।

आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे।

और सचमुच वे जीवन भर आजाद ही रहे। आजाद रहकर उन्होंने देश की आजादी का मार्ग प्रशस्त किया

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